Thursday, January 20, 2022
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नगालैंड में बढ़ा गुस्सा, मृतकों को श्रद्धांजलि दे CM ने की AFSPA हटाने की मांग,

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नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो सोमवार को मोन जिले में सुरक्षाबलों की फायरिंग से मरने वाले नागरिकों को अंतिम विदाई देने पहुंचे। इस दौरान उन्होंने एक बार फिर से राज्य में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट यानी AFSPA को हटाने की मांग की। रियो ने कहा कि उग्रवाद पर नियंत्रण पाने के लिए यह कानून लागू किया गया था तो फिर अब तक यह क्यों वापस नहीं लिया गया। बता दें कि रविवार को सुरक्षाबलों की फायरिंग में 14 नागरिकों की मौत के बाद नगालैंड में एक बार फिर से आफ्स्पा कानून हटाए जाने की मांग तेज हो गई है। यह घटना ऐसे समय हुई है जब केंद्र सरकार लगातार नगा विद्रोही गुटों के साथ शांति वार्ता कर रही है। इस बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने पीएम मोदी से मुलाकात भी की है। 

दरअसल आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट नगालैंड में कई दशकों से लागू है। सन् 1958 में संसद ने ‘अफस्पा ‘ यानी आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर ऐक्ट लागू किया था।  भारत में संविधान लागू होने के बाद से ही पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ रहे अलगाववाद, हिंसा और विदेशी आक्रमणों से प्रतिरक्षा के लिए मणिपुर और असम में 1958 में AFSPA लागू किया गया था। सन् 1972 में कुछ संशोधनों के बाद असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नगालैंड सहित समस्त पूर्वोत्तर भारत में लागू किया गया था।

पीड़ित परिवारों को 5 लाख का मुआवजा देगी नगालैंड सरकार
नगालैंड सरकार ने मोन जिले में मारे जाने वालों के परिवार को 5-5 लाख रुपये का मुआवजा देने का ऐलान किया है। नगालैंड के परिवहन मंत्री पैवंग कोनयक ने रविवार रात को ग्राम समिति के चेयरमैन को मुआवजे की राशि सौंप दी है। कोनयक ने यह भी बताया कि घायलों को 50-50 हजार रुपये की आर्थिक मदद दी गई है। 

रविवार को क्या हुआ था?
रविवार को नगालैंड के मोन जिले में सुरक्षाबलों ने फायरिंग की थी। यहां कुछ लोग खदानों में काम करने गए थे। देर शाम तक इनके वापस न आने पर परिजन इन्हें खोजने निकले और देखा कि एक पिकअप वैन में 6 युवकों के शव लथपथ पड़े थे। इन शवों के बाद स्थानीय लोगों में आक्रोश भर गया और फिर पता लगा कि सुरक्षा बलों की फायरिंग के कारण ये युवक मरे। घटना से आक्रोशित लोगों ने सुरक्षाबलों की गाड़ियां जलाईं और एक बार फिर से सुरक्षाबलों ने फायरिंग की, जिसमें कुछ और लोगों की जान चली गई। खबरों के मुताबिक, सुरक्षाबलों ने 6 मजदूरों को नगा उग्रवादी समझकर फायरिंग कर दी थी। 

कानून हटाने की मांग फिर हुई तेज
सबसे बड़े नगा उग्रवादी समूह नेशनलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम ने इस हमले के बाद भारतीय सुरक्षाबलों की आलोचना की है। समूह के प्रमुख इजाक मुईवाह ने नागरिकों की हत्या को नगाओं के इतिहास में काला दिन बताया है। बता दें कि केंद्र सरकार के साथ शांति वार्ता करने वाले पांच बड़े विद्रोही समूहों में एनएससीएन भी शामिल है। वहीं, निकी सुमी की अगुवाई वाली खापलांग धड़े ने भी शांति वार्ता के बीच नागरिकों की हत्या को लेकर हैरानी जताई है। इस समूह ने कहा है कि लंबे समय से नगा लोगों को दोस्त के रूप में आने वाले सुरक्षाबलों की बर्बरता झेलनी पड़ी है। नगा न्याय मांग रहे हैं और भारत सरकार को अब इस मामले की जांच शुरू करने में देरी नहीं करनी चाहिए।

कानून पर क्यों उठते रहते हैं सवाल?
इस कानून की धारा-4 के अनुसार, सुरक्षा बल का अधिकारी संदेह होने पर किसी भी स्थान की तलाशी ले सकता है और खतरा होने पर उस स्थान को नष्ट करने के आदेश दे सकता है। इस कानून के तहत सेना के जवानों को कानून तोड़ने वाले व्यक्ति पर गोली चलाने का भी अधिकार है। यदि इस दौरान उस व्यक्ति की मौत भी हो जाती है तो उसकी जवाबदेही गोली चलाने या ऐसा आदेश देने वाले अधिकारी पर नहीं होगी। सशस्त्र बल किसी भी व्यक्ति को बिना किसी वॉरंट के गिरफ्तार कर सकते हैं। गिरफ्तारी के दौरान वे किसी भी तरह की शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसे अशांति वाले इलाकों में लागू किया जाता है। 

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