Wednesday, February 28, 2024

सेमीफाइनल जीतना क्या फाइनल जीतने की गारंटी है? Lok Sabha Election 2024

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बीजेपी ने लोकसभा का सेमीफाइनल कहे जा रहे विधानसभा चुनाव जीत हासिल कर ली है तो वहीं कांग्रेस को तेलंगाना में जीत से संतुष्ट होना पड़ा

बड़ी जीत के बाद 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी के सामने खड़ी हो सकती हैं चुनौतियां

बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के सेमीफाइनल माने जा रहे विधानसभा चुनाव को 3-1 से जीत लिया है. पार्टी ने मध्यप्रदेश में 163, राजस्थान में 115 तो वहीं छत्तीसगढ़ में 54 सीटों पर बहुमत के साथ जीत का परचम लहराया.  वहीं तेलंगाना में कांग्रेस ने 64 सीटें जीतकर सरकार बनाने जा रही है.

छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस इस बार चुनाव में फिर वापस लौटने के सपने देख रही थी तो वहीं मध्यप्रदेश में सत्ता विरोधी लहर को उसने खूब भुनाने की कोशिश की. हालांकि रविवार को आए मतगणना के परिणामों ने सब कुछ साफ तो किया ही साथ ही चौंका भी दिया.

दरअसल राजनीतिक विश्वेषकों ने इस तरह के चुनावी परिणामों की कल्पना भी नहीं की थी. वहीं राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी को काफी समय से कमजोर बताया जा रहा था. लेकिन मध्यप्रदेश के अलावा पार्टी ने दोनों राज्यों में बहुमत हासिल किया कर कांग्रेस की सारी रणनीतियों पर पानी फेर दिया.

बीजेपी की इस बड़ी जीत के बाद नरेंद्र मोदी दिल्ली स्थित पार्टी के कार्यालय पहुंचे और उन्होंने कहा कि आज की हैट्रिक ने 2024 की हैट्रिक की गारंटी दे दी है. लेकिन अब सवाल ये उठता है कि चुनावी सेमीफाइनल में इस बड़ी जीत के बाद बीजेपी के लिए फाइनल का रास्ता भी उतना ही आसान है?

सेमीफाइनल क्यों कहा गया ये चुनाव?
चार राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना) में विधानसभा चुनाव को सेमीफाइनल इसलिए भी कहा गया क्योंकि अगले साल यानी 2024 में ही लोकसभा चुनाव होने हैं और इन 4 राज्यों से लोकसभा 82 सीटें है

देश में लोकसभा की कुल 542 सीटें हैं. जिनमें से मध्यप्रदेश में 29, राजस्थान में 25, छत्तीसगढ़ में 11, तेलंगाना में 17 और मिजोरम में एक सीट है. इन्हें जोड़ दें तो पांचों राज्यों में कुल 83 सीटें हैं.

ऐसे में इस सेमीफाइनल में जीत हासिल करने वाली पार्टी के लिए इन सीटों पर जीत लोकसभा की राह और आसान कर सकती है. हालांकि 2003 के बाद से लोकसभा और विधानसभा चुनाव को पैटर्न एक जैसा नहीं रहा है.

बीजेपी के लिए आसान है 2024?
ये सभी जानते हैं की बीजेपी पार्षद से लेकर लोकसभा चुनाव तक को पूरी शिद्दत से लड़ती है. हर चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी का हर कार्यकर्ता एक्टिव हो जाता है. ऐसे में इस विधानसभा चुनाव में हुई इस बड़ी जीत को पार्टी अब लोकसभा चुनाव में भी भुनाने का काम करेगी.

इसके इतर विश्लेषकों की मानें तो पार्टी इस बड़ी जीत के जश्न को अब लेकर लोकसभा चुनाव तक बनाए रखने की कोशिश करेगी. वहीं मुद्दों से इतर राजनीति करने वाली बीजेपी को ये जीत बड़ा फायदा पहुंचा सकती है. वहीं विश्लेषक ये भी मानते हैं कि इन राज्यों की जीत ने आने वाले समय के लिए बीजेपी कार्यकर्ताओं में जोश भरने का काम किया है. ऐसे में आने वाले चुनाव के लिए कार्यकर्ता जोशीले अंदाज में चुनाव लड़ेंगे.

वहीं इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अब भी मोदी मैजिक बरकरार है. जिसे इस लोकसभा चुनाव में भी भुनाने की पूरी कोशिश की जाएगी. जिससे पार्टी को फायदा होने का अनुमान है.

विपक्ष का इंडिया गठबंधन कर पाएगा काम?
26 विपक्षी पार्टियों ने इसी साल जुलाई महीने में बीजेपी को टक्कर देने के लिए गठबंधन किया जिसे नाम दिया गया इंडियन नेशनल डिवेलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस यानी ‘इंडिया’.

इस गठबंधन को लोकसभा चुनाव के लिए बनाया गया है इसलिए विधानसभा चुनाव में सभी पार्टियों ने अपने स्तर पर चुनाव लड़ा. हालांकि इस गठबंधन का विधानसभा चुनाव में साथ नजर आना भी विपक्ष को फायदा पहुंचा सकता था. साथ ही सपा के साथ मध्यप्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ का जो व्यवहार भी चर्चा में रहा है.  ऐसे में यदि सपा प्रमुख अखिलेश यादव का गुस्सा लोकसभा चुनाव में नजर आता है तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को एक बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

इसके अलावा कमलनाथ द्वारा अखिलेश यादव के लिए आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग करना भी इस गठबंधन की स्थिति को उजागर करता है. वहीं जब इंडिया गठबंधन के एक नेता उदयनिधि स्टालिन ने सनातन पर बयान दिया था उस वक्त कई जगहों पर उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था.  इंडिया गठबंधन में शामिल कई बड़े नेताओं ने उनसे दूरी बना ली थी.

हालांकि चुनावी विश्लेषक ये भी मानते हैं कि विधानसभा चुनाव में आए इन परिणामों से ‘इंडिया’ गठबंधन में सीटों पर समझौते की राह आसान हो सकती है क्योंकि अब बिना कांग्रेस  छोटी से लेकर बड़ी पार्टियों से बातचीत कर सकती हैं.

बीजेपी की मुश्किलें
भारतीय राजनीति हमेशा से कल्पनाओं से परे रही है. पिछले यानी 2019 में हुए लोकसभा चुनाव पर नजर डालें तो इन्हीं इन्हीं तीन राज्यों (एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान) में बीजेपी की हार हुई थी, लेकिन आम चुनाव में बीजेपी पर इस हार का असर नजर नहीं आया. तीनों ही राज्यों में बीजेपी ने कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया कर दिया था.  यही वजह है कि चुनावी विश्लेषक अक्सर इन कयासों से बचते हैं कि विधानसभा चुनाव परिणामों को असर लोकसभा में भी दोहराया जाएगा.

वहीं बीबीसी से हुई बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता ने बताया कि 2019 में जब  पीएम नरेंद्र मोदी बने तो उससे पहले पुलवामा और बालाकोट जैसी घटनाएं हो गई थीं. जिसके बाद पूरे देश में राष्ट्रवाद का माहौल बना और उसका फायदा बीजेपी को मिला, लेकिन ऐसा हर बार नहीं हो सकता है, इसलिए इन चुनावों को लेकर बीजेपी पहले से ज्यादा सतर्क थी. उन्होंने आगे बताया कि बीजेपी 10 साल से सत्ता में है. 10 साल की एंटी इनकंबेंसी लोकसभा के चुनावों में दिखाई दे सकती है. इसके अलावा बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों का सामना भी बीजेपी को करना पड़ेगा. इसके अलावा विपक्ष पिछले कुछ समय से लगातार जातिगत सर्वे और ओबीसी के मुद्दे को लेकर चल रहा है. यदि इसका असर आमजन में होता है तो आने वाले समय में बीजेपी के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

विधानसभा में जीत से होती है लोकसभा की सीट पक्की?
यदि पिछले कुछ आंकड़ों पर नजर डालें तो विधानसभा चुनाव में जीत लोकसभा की जीत की गारंटी नहीं देता.

मध्यप्रदेश- मध्यप्रदेश के सियासी इतिहास पर नजर डालें तो 1998 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जीती थी, लेकिन इसके दूसरे ही साल यानी 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने जीत का ताज पहना था. वहीं 2003 और 2004 में हुए विधानसभा और लोकसभा दोनों ही चुनाव में बीजेपी को जीत हासिल हुई थी. इसके अलावा 2008 में बीजेपी ने विधानसभा चुनाव जीता था और 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में उसे राज्य में 29 में से 16 सीटें मिली थीं.

साल 2013 में भी बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की थी और नरेंद्र मोदी के चेहरे पर 2014 में लड़े गए विधानसभा चुनाव में भी उसे बड़ी जीत हासिल हुई थी. 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर रही. हालांकि कमलनाथ सरकार बनाने में कामयाब रहे लेकिन 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को राज्य में सिर्फ एक सीट से संतुष्ट होना पड़ा. हालांकि 20 महीने बाद ही कांग्रेस की सरकार गिर गई थी और शिवराज फिर अपनी सरकार बनाने में सफल रहे.

इस मुद्दे पर जब हमने वरिष्ठ पत्रकार राजेश पांडे से बातचीत की तो उनका कहना था कि राजनीति संभावनाओं का खेल है. ये जरूरी नहीं है कि जो पार्टी विधानसभा चुनाव जीती है वो लोकसभा में भी जीत हासिल करे लेकिन नरेंद्र मोदी अभी भी एक ब्रांड है. वो आगे कहते हैं कि यदि नरेंद्र मोदी ने विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के लिए वोट मांगा तब इतनी बड़ी जीत हासिल हुई तो लोकसभा चुनाव में जब वो अपने लिए वोट मांगेंगे तब क्या होगा. राजेश पांडे संभावना जताते हुए कहते हैं कि विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखते हुए अब लोकसभा में बीजेपी की जीतने की अधिक संभावना लग रही है.

राजस्थान- राजस्थान के इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो 1998 में राजस्थान में कांग्रेस ने बड़ी जीत हासिल की और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने, लेकिन इसके ठीक दूसरे ही साल यानी 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की थी. इसके बाद 2003 से लेकर 2014 तक राजस्थान का इतिहास ऐसा रहा कि जो पार्टी विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करती वो ही लोकसभा चुनाव में भी जीत का स्वाद चखती रही.

हालांकि साल 2018 में इस पैटर्न में बदलाव देखा गया, जब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने तो जीत हासिल की लेकिन 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में 25 में से 24 सीटों पर जीत हासिल कर बीजेपी ने खेल पलट दिया. इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हुई थी.

जब हमने राज्य की राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी से बातचीत की तो उन्होंने राज्य के राजनीतिक इतिहास को दोहराते हुए बताया कि ये जरूरी नहीं है कि जो पार्टी विधानसभा चुनाव जीती है उसे लोकसभा में भी जीत हासिल हो. सैनी इंडिया गठबंधन को भी बीजेपी के लिए चुनौती मानते हैं. उनका कहना है कि सभी को ये जरूर लग रहा है कि इंडिया गठबंधन बिखर रहा है लेकिन ऐसा नहीं है. लोकसभा चुनाव में ये गठबंधन कुछ नया कर सकता है.

छत्तीसगढ़- छत्तीसगढ़ साल 2000 में अलग राज्य घोषित हुआ था. जहां 2003 के बाद से विधानसभा और लोकसभा में बीजेपी ही जीत का ताज पहनती रही, उस समय कांग्रेस को महज एक या दो सीटों से ही संतुष्ट होना पड़ा था. हालांकि 2018 में यहां की सियासत बदली और कांग्रेस को 90 में से 68 सीटों पर जीत हासिल हुई. लेकिन लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने जीत का ताज पहना था.

जब हमने राज्य की राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले आलोक पुतल से प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों पर बात की तो उनका कहना था कि छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव परिणाम चौंकाने वाले नहीं थे. जमीनी स्तर पर कहीं न कहीं सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर थी जिसका असर चुनावी परिणामों में भी दिखा. हालांकि वो इस बात से इनकार करते हैं कि विधानसभा के चुनावी परिणाम लोकसभा में भी दिखते हैं. आलोक पुतल 2024 के लोकसभा चुनावों पर बात करते हुए कहते हैं कि मोदी अभी भी ब्रांड हैं और आने वाला चुनाव उनके नाम पर ही लड़ा जाता है तो बीजेपी को जीत हासिल हो सकती है. हालांकि आलोक ‘राजनीति में कुछ भी हो सकता है’ की बात को भी मानते है.

तेलंगाना- साल 2013 में तेलंगाना का गठन हुआ. उसके बाद से अब तक राज्य में तीन विधानसभा और दो लोकसभा चुनाव हुए हैं. 2013-14 और 2018-19 में यहां मिले-जुले परिणाम देखने को मिले तो वहीं 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में राज्य में कांग्रेस ने जीत हासिल की है. बीजेपी को यहां महज 8 सीटों से संतुष्ट होना पड़ा.

मिजोरम- वहीं मिज़ोरम में बीजेपी की सहयोगी पार्टी मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है. इसके अलावा राज्य में जोराम पीपल्स मूवमेंट मुख्य विपक्षी दल है. राज्य के राजनीतिक इतिहास को देखें तो यहां 1998 से 208 तक एमएनएफ की सरकार रही और 1999 से 2004 तक इसी पार्टी का उम्मीदवार लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करता रहा. 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में भी एमएनएफ ही सत्ता में लौटी और लोकसभा चुनाव में भी इसी पार्टी के उम्मीदवार ने जीत हासिल की थी.

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