Thursday, January 20, 2022
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कंगाल होते श्रीलंका ने चीन से लगाई मदद की गुहार

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GBN24: अमरेन्द्र जयसवाल-

आर्थिक संकट से गुजर रहे श्रीलंका के राष्ट्रपति ने चीन से वित्तीय मदद मांगी है. देश के दौरे पर आए चीन के विदेश मंत्री वांग यी से राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्सा ने गुहार लगाई.भारी आर्थिक संकट झेल रहे श्रीलंका ने चीन से आग्रह किया है कि उसके कर्ज को पुनर्गठित कर दिया जाए और जरूरी चीजों के आयात के लिए और राहत दी जाए. चीन के विदेश मंत्री वांग यी श्रीलंका के दौरे पर थे. श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्सा ने वांग यी से कहा, “देश को बड़ी राहत होगी अगर कोविड-19 महामारी के चलते खड़े हुए आर्थिक संकट के हल के तौर पर कर्ज अदायगी की किश्तों के पुनर्गठन पर ध्यान दिया जाए.” राजपक्सा ने वांग से जरूरी चीजों के आयात के लिए भी वित्तीय राहत मांगी है ताकि उद्योग बिना किसी बाधा के काम कर सकें. उन्होंने यह गुजारिश भी की है कि चीनी पर्यटकों को श्रीलंका की यात्रा के लिए एक विशेष बबल स्थापित कर बढ़ावा दिया जाए. नहीं आया चीनी मदद का ऐलान वांग यी ने राष्ट्रपति के भाई और देश के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्सा के साथ कोलंबो पोर्ट सिटी का दौरा किया. इस द्वीप को चीन ने अपने निवेश से विकसित किया है. दोनों देशों के 65 साल के कूटनीतिक संबंधों का जश्न मनाने के लिए 65 नौकाओं को समुद्र में उतारा गया. द्वीप पर अपने भाषण में वांग यी ने कहा कि लगातार जारी महामारी ने आर्थिक पुनरोद्धार को मुश्किल बना दिया है और दोनों देशों को मिलकर काम करना होगा.

हालांकि उन्होंने किसी तरह की मदद या राहत की घोषणा नहीं की. श्रीलंका अब तक का सबसे बुरा आर्थिक संकट झेल रहा है. विदेशी मुद्रा भंडार 1.6 अरब डॉलर गिर गया है जो कुछ हफ्तों के आयात के लिए भी नाकाफी है. देश पर भारी कर्ज है और 2022 में उसे सात अरब डॉलर चुकाने हैं. 50 करोड़ डॉलर की किश्त जनवरी में जानी है जबकि एक अरब डॉलर की किश्त जुलाई में अदा करनी है. घटते विदेशी मुद्रा भंडार की एक वजह चीन से कर्ज लेकर तैयार की गईं परियोजनाओं को बताया जा रहा है, जहां से कोई आय नहीं हो रही है. चीन ने देश में सड़कों का जाल बिछाने के अलावा दक्षिणी हंबंतोता जिले में बंदरगार और हवाई अड्डा बनाने के लिए श्रीलंका को भारी कर्ज दिया था. तकनीकी रूप से दीवालिया देश के केंद्रीय बैंक के आंकड़े दिखाते हैं कि श्रीलंका पर चीन का 3.38 अरब डॉलर का कर्ज है. इसके अलावा कई सरकारी कंपनियों ने अलग से कर्ज ले रखा है जिसकी मात्रा काफी बड़ी है

पॉइंट पेड्रो इंस्टीट्यूट ऑफ डिवेलपमेंट के मुख्य शोधकर्ता मुत्तुकृष्णा सर्वनाथन कहते हैं, “तकनीकी रूप से हम दावा कर सकते हैं कि हम दीवालिया हो गए हैं. जब आपका विदेशी मुद्रा भंडार लाल निशान पर पहुंच जाए तो तकनीकी रूप से आप दीवालिया हो जाते हैं.” आर्थिक संकट का असर आम जनजवीन पर भी देखा जा सकता है. लोग दूध, गैस और केरोसीन जैसी रोजमर्रा की जरूरत की चीजों के लिए लंबी-लंबी कतारों में खड़े हैं. महंगाई आसमान पर है और केंद्रीय बैंक का कहना है कि नवंबर के 9.9 फीसदी से बढ़कर दिसंबर में महंगाई दर 12.1 प्रतिशत पर पहुंच गई है. इस दौरान खाद्य मुद्रास्फीदी 22 प्रतिशत बढ़ गई थी. विदेशी मुद्रा की कमी के कारण आयातक अपना सामान नहीं छुड़ा पा रहे हैं जिसमें जरूरी चीजों की सप्लाई है. साथ ही विनिर्माण कंपनियां विदेशों से कच्चा माल आयात नहीं कर पा रही हैं. विदेशों में रहने वाले नागरिकों द्वारा भेजा जा रहा धन भी कम हो गया है क्योंकि सरकार ने विदेशी मुद्रा के रेट पर नियंत्रण लगा दिया है

अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां पहले ही श्रीलंका की रेटिंग कम कर चुकी हैं जिस कारण देश की उधार लेने की क्षमता और कम हो गई है. दिसंबर में फिच रेटिंग्स ने कहा था कि कर्ज के वापस ना मिलने की संभावनाएं बढ़ गई हैं. भारत-चीन के बीच श्रीलंका श्रीलंका के मौजूदा हालात ने इस द्वीपीय देश को लेकर दो बड़ी दक्षिण एशियाई ताकतों भारत और चीन के बीच जारी संघर्ष को और उजागर कर दिया है. चीनी विदेश मंत्री के श्रीलंका के नेताओं से मिलने से पहले भारत के एक प्रमुख राजनयिक ने रविवार को सुबह कोलंबो से दक्षिणी हिस्सों को जाने वाली एक ट्रेन सेवा का उद्घाटन किया. इस ट्रेन के डिब्बे भारत के कर्ज द्वारा उपलब्ध कराया गया है.

भारतीय दूतावास ने विनोद जैकब के हवाले से कहा, “भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पड़ोस-प्रथम नीति के तहत श्रीलंका प्राथमिकता है.” उन्होंने कहा कि हाल ही में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी बयान दिया था कि मुश्किल वक्त में भारत श्रीलंका की मदद करेगा. राजनीतिक विश्लेषक रंगा कलनसूर्या कहते हैं, “हम देख सकते हैं कि श्रीलंका संभावित मदद के लिए भारत और चीन के बीच फंसा हुआ है. भारत कुछ समय से धीमे कदम उठा रहा है जबकि चीन इन हालात का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने की जुगत में है.” कलनसूर्या कहते हैं कि चीन के मदद देने की संभावना कम है और वह ज्यादा औद्योगिक मौकों की तलाश में होगा

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