Monday, May 23, 2022
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आहत सभ्यता को सुनने की कहानी है ”द कश्मीर फाइल्स”

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द कश्मीर फाइल्स में एक संवाद है ”टूटे हुए लोग अपनी कहानी सुनाते नहीं, उनकी कहानी सुननी पड़ती है।” आहत सभ्यताओं के बारे में भी यह बात सटीक बैठती है। भारतीय सभ्यता की कहानी भी लम्बे समय से फिल्मी दुनिया में सही ढंग से नहीं सुनी गई है। अब अरसे बाद ”द कश्मीर फाइल्स” के रूप में आहत भारतीय सभ्यता के एक अध्याय को दिल से सुनने की प्रयास हुआ है। परदे पर एक अमानवीय अध्याय को कहने की साहस से कोशिश हुई है। क्योंकि फिल्मी दुनिया का समाज पर एक जबरदस्त प्रभाव है, इसलिए इस नई कोशिश को लेकर समाज में एक अभूतपूर्व आक्रोश और उद्वेलन दिख रहा है।

संभवतः बाहुबली सीरीज के बाद यह पहली ऐसी फिल्म है, जिसको लेकर भारतीय समाज इतना उद्वेलित है। अधिक स्क्रीन देने का दबाव या फ्री टिकट उपलब्ध कराने जैसी खबरें यह साबित करती कि इस फिल्म को लेकर समाज किस तरह उत्साहित है। ऐसा कहा जा सकता है कि बाहुबली से भारतीय सिनेमा में बदलाव की जो यात्रा शुरू हुई, वह अब एक नए पड़ाव पर पहुंच गई है। भारतीय यथार्थ को बेझिझक होकर कहने का आत्मविश्वास भारतीय सिनेमा ने ”द कश्मीर फाइल्स” के साथ हासिल कर लिया है।  

इस फिल्म की ताकत तकनीक नहीं पटकथा, कहानी और अभिनय है। कभी डॉ. चंद्रप्रकश द्विवेदी के धारावाहिक चाणक्य का उदाहरण उसकी पटकथा के लिए दिए जाता था। इसमें ऐतिहासिक और सभ्यतागत विमर्श को जिस तरह से पटकथा में कुशलता के साथ बुना गया, उसने चाणक्य के संवाद को आम भारतीय के संवाद और तर्क का हिस्सा बन गया। बाद में अ वेडनेसडे जैसी फिल्मों ने अपनी कसी हुई कहानी और सधी हुई पटकथा के लिए प्रसिद्धि पाई।

‘द कश्मीर फाइल्स” पटकथा और कहानी बुनने की कला को नई ऊंचाई देती है। घटनाओं के सच को जिस तरह से कहानी और पटकथा में ढाला गया है, वह दर्शक को झकझोर कर रख देता है। एक ऐसे दौर में जब एनीमेशन, 3 डी फिल्में सफलता के झंडे गाड रही हैं तब ”द कश्मीर फाइल्स” की सफलता इसे और भी खास बना देती है। ‘मीडिया वाले बाहर से नहीं अंदर से बदलते हैं  जो नदरू नहीं जानता, वह कश्मीर नहीं जानता’ और  ‘जब तक सच जूते पहनता है तब तक झूठ दुनिया का चक्कर लगा के आ जाता है’ जैसे संवाद दर्शक की समझ और जेहन दोनों को बदल देते हैं।

”द कश्मीर फाइल्स” को देखने के बाद युवाओं में आश्चर्य, आक्रोश और उत्साह अधिक है। अधिकांश युवाओं को ऐसा लगता है किसी झूठी दुनिया से निकालकर उन्हें यकायक कठोर सच्चाई से रू-ब-रु करा दिया गया हो। युवाओं को यह भी लगता है कि जब तीन दशकों पहले घटनाओं के बारे में झूठ और भ्रम रचा जा सकता है तो सुदूर भारतीय इतिहास के साथ किस कदर खिलवाड़ किया गया होगा, उसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।

कहानी को जिस साहस के साथ कहा गया है, वह इस फिल्म को एकदम अलहदा बना देती है। ऐसी खबरें आई थी कि फिल्म उरी लम्बे समय तक इसलिए फंसी रही है क्योंकि उसके एक संवाद में 72 हूरों का जिक्र था। बाद में वह संवाद बदलना पड़ा। इस फिल्म ने शब्दों, दृश्यों और विषयों को लेकर झिझक तोड़ी है। फिल्म में काफिर, आतंकवाद, साम्यवाद जैसे शब्दों का खुलकर इस्तेमाल हुआ है। अत्याचार के दृश्यों को पूरे संजीदगी साथ फिल्माया गया है। मीडिया, पुलिसिया तंत्र और प्रशासन पर ऐसे संदर्भो के साथ तंज कसे गए हैं, जिनका उपयोग अभी तक भारतीय सिनेमा करने से बचता रहा है।

सिनेमा का उपयोग भारत के सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करने के लिए प्रतिस्पर्धी शक्तियां करती रही है, अब भारत ने इस नए हथियार को समझकर ऐसी शक्तियों को उत्तर देना प्रारंभ किया है। आख्यानों की दुनिया में ”द कश्मीर फाइल्स”  शुरुआती लेकिन साहसी और प्रभावी प्रत्युत्तर है।

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