अरावली क्यों है जीवनरेखा
तेजी से बढ़ती गर्मी, गिरता भूजल और जहरीली हवा के पीछे अरावली पहाड़ियों के कमजोर होने को बड़ा कारण माना जा रहा है | अरावली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक है, जो थार रेगिस्तान को उत्तर भारत की ओर बढ़ने से रोकती है | यह बारिश के पानी को जमीन में समाकर भूजल रिचार्ज करती है और दिल्ली-एनसीआर की हवा को साफ रखने में मदद करती है | लेकिन अवैध खनन, जंगलों की कटाई और अनियंत्रित निर्माण ने इस प्राकृतिक ढाल को गंभीर नुकसान पहुंचाया है |
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप क्यों जरूरी हुआ
अरावली में वर्षों से नियमों के खिलाफ खनन हो रहा था | अलग-अलग राज्यों में अरावली की अलग परिभाषा होने से भ्रम पैदा हुआ, जिसका फायदा खनन माफिया उठाते रहे | इस स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति बनाकर अरावली की एक समान और वैज्ञानिक परिभाषा तय करने का निर्देश दिया, ताकि पूरे क्षेत्र में संरक्षण सुनिश्चित हो सके |
नई परिभाषा और सख्त नियम
नई परिभाषा के अनुसार, आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची जमीन अरावली पहाड़ी मानी जाएगी | इसमें चोटी, ढलान, तलहटी और जुड़े इलाके सभी शामिल होंगे | साथ ही, 500 मीटर के भीतर स्थित पहाड़ियों को एक ही श्रेणी माना जाएगा | नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इन सिफारिशों को मंजूरी देते हुए संवेदनशील क्षेत्रों में खनन पर रोक और नए पट्टों पर प्रतिबंध जारी रखने का आदेश दिया |
राजनीति, विरोध और आम आदमी पर असर
केंद्र सरकार ने खनन बढ़ाने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि नई व्यवस्था से अरावली का 90% से ज्यादा हिस्सा संरक्षित होगा | वहीं, ‘सेव अरावली आंदोलन’ से जुड़े नेता, जैसे अशोक गहलोत और रविंद्र सिंह भाटी, 100 मीटर मानक पर सवाल उठा रहे हैं | उनका कहना है कि इससे कई इलाके संरक्षण से बाहर हो सकते हैं | बावजूद इसके, यह फैसला हवा, पानी और जलवायु संतुलन के लिहाज से आम लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है |













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