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21वीं सदी में भी भारत में प्यार, इंसानियत और जातिगत दबाव: नांदेड़ का दुखद मामला

A young woman applying sindoor on her deceased boyfriend’s forehead during his funeral, symbolizing her protest against caste and family-based violence in India.

जाति और परिवार का दबाव आज भी इंसानियत पर भारी

21वीं सदी है… 2025 में भी, भारत में प्यार और इंसानियत अक्सर जाति और परिवार की पुरानी सोच से हार जाती है। महाराष्ट्र के नांदेड़ का मामला इसे स्पष्ट रूप से बयां करता है। समाज में अभी भी जातिगत और पारिवारिक दबाव लोगों के जीवन और खुशियों पर भारी पड़ता है।

साक्षम और आंचल की कहानी

20 साल के साक्षम टेट, जो बौद्ध समुदाय से थे, अपनी प्रेमिका आंचल ममिलवाड़ से शादी करना चाहते थे। लेकिन लड़की के परिवार ने इस रिश्ते को जातिगत और पारिवारिक दबाव के कारण खारिज कर दिया। यह केवल एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि हमारे समाज में व्याप्त जातिवाद और पारिवारिक नियंत्रण का उदाहरण है।

हिंसा और हत्या

जब परिवार को पता चला कि दोनों शादी करने वाले हैं, उन्होंने साक्षम को फंसाकर बेरहमी से हमला किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उसके सिर पर पत्थर मारकर उसे मौके पर ही मार दिया गया। यह घटना सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि समाज में मौजूद जातिगत हिंसा और अन्याय की भयावह वास्तविकता को उजागर करती है।

आंचल का साहस और न्याय की मांग

अंतिम संस्कार के दौरान आंचल ने साक्षम के माथे पर सिंदूर लगाकर कहा—
“उन्होंने उसे मार दिया, लेकिन मैं इसके खिलाफ खड़ी हूँ। मैं चाहती हूँ कि मेरे पिता और भाई को सजा मिले। और मैं अब अपने ससुराल में ही रहूँगी।”
यह सिर्फ प्यार की कहानी नहीं है; यह साहस और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का प्रतीक भी है।

समाज और सरकार पर सवाल

21वीं सदी में भी भारत में ऐसे भयावह मामले हो रहे हैं। प्यार, इंसानियत और जाति विरोधी साहस अभी भी समाज और व्यवस्था के खिलाफ खड़ा है। सवाल यह है—क्या अब हमारा समाज और सरकार बदलाव के लिए तैयार हैं, या हम अब भी इन पुरानी सोचों और जातिगत दबावों में फंसे रहेंगे?

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