बिहार में बुल्डोज़र अभियान का सिलसिला
अभी बिहार में सरकार लगातार लोगों के घरों और दुकानों पर बुल्डोज़र चला रही है। हाल ही में 23 नवंबर को राज्य सरकार के आदेश पर municipal corporation ने कई घर और दुकानों को तोड़ा। सरकार का कहना है कि यह कार्रवाई illegal encroachment को हटाने के लिए की जा रही है, यानी जब लोग बिना किसी कानूनी मंजूरी के सरकारी ज़मीन, फुटपाथ या सड़क पर निर्माण कर लेते हैं।
प्रशासन का तर्क और कानून
प्रशासन का तर्क है कि ऐसे अतिक्रमण से सड़कें पतली हो जाती हैं, ट्रैफिक जाम बढ़ता है और आम जनता को परेशानी होती है। इस कार्रवाई को Bihar Public Encroachment Act, 1956 के तहत अंजाम दिया जा रहा है। सरकार इसे विकास और शहर नियोजन के दृष्टिकोण से ज़रूरी मानती है।
लोगों की शिकायतें और विवाद
लेकिन जिन लोगों के घर टूटे हैं, उनका कहना है कि उन्हें proper notice नहीं दिया गया। कुछ लोग तो दावा कर रहे हैं कि उनके सभी दस्तावेज़ बिल्कुल legal थे, फिर भी उनकी संपत्ति तोड़ दी गई। इससे यह सवाल उठता है कि क्या कार्रवाई पूरी तरह से पारदर्शी और न्यायसंगत हो रही है।
बिहार में पहले भी ऐसे गलत demolition के मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें सरकार को प्रभावित लोगों को लगभग 5 लाख रुपये तक का compensation देना पड़ा था। यह बताता है कि अतिक्रमण हटाने में कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी गंभीर नतीजे ला सकती है।
विकास या निर्दोषों पर मार?
कल तक कुछ लोगों ने सत्ता की नीतियों का समर्थन किया था, लेकिन अब उनके ही घर टूटने लगे। अतिक्रमण हटाने में कोई बुराई नहीं है, यह ज़रूरी भी है। लेकिन जब घर तोड़ने से पहले सही तरीके से जांच और नोटिस नहीं दिया जाता, तो सबसे अधिक मार उन निर्दोष लोगों पर पड़ती है। सवाल यह है कि क्या यह बुल्डोज़र एक्शन विकास के लिए सही है, या सरकार को इसे लागू करने से पहले और सावधानी बरतनी चाहिए?













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