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ढाका की अदालत ने शेख हसीना को मौत की सज़ा सुनाई, पूर्व प्रधानमंत्री ने फैसले को बताया “राजनीतिक प्रतिशोध”

Dhaka court sentences Sheikh Hasina to death during political turmoil.

पूर्व प्रधानमंत्री को मौत की सज़ा

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में एक विशेष न्यायाधिकरण ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को 2024 के विरोध प्रदर्शनों पर हुई घातक कार्रवाई का जिम्मेदार मानते हुए मौत की सज़ा सुनाई है। अदालत ने आरोप लगाया कि उनके शासनकाल में सुरक्षा बलों को विरोध को दबाने के लिए अत्यधिक बल प्रयोग की अनुमति दी गई, जिसके परिणामस्वरूप भारी जनहानि हुई। हसीना इस सुनवाई के दौरान मौजूद नहीं थीं और भारत में निर्वासन में रह रही हैं।

हसीना का कड़ा पलटवार—“फैसला पक्षपातपूर्ण और अवामी लीग को खत्म करने की साज़िश”

सज़ा सुनाए जाने के बाद जारी अपने पाँच पन्नों के बयान में हसीना ने इस फैसले को “पक्षपातपूर्ण, राजनीतिक रूप से प्रेरित और सत्ता पर कब्जा जमाने की कोशिश” बताया। हसीना ने दावा किया कि अंतरिम सरकार उनकी पार्टी अवामी लीग को कमजोर करने के लिए न्यायालय का इस्तेमाल कर रही है। उन्होंने कहा कि वह किसी भी निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय अदालत में अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों का सामना करने को तैयार हैं।

2024 के छात्र आंदोलनों की पृष्ठभूमि और विवादित कोटा नीति

यह पूरा मामला 2024 में शुरू हुए उन व्यापक छात्र आंदोलनों से जुड़ा है, जिनमें सरकारी नौकरियों में 30% कोटा प्रणाली का विरोध किया गया था। छात्रों का आरोप था कि इस कोटा का लाभ वास्तविक युद्ध नायकों के वंशजों की जगह अवामी लीग समर्थकों को दिया जा रहा था। जैसे-जैसे प्रदर्शन उग्र हुए, पुलिस और सुरक्षा बलों के साथ झड़पें बढ़ती गईं और कई लोगों की जान चली गई, जिसे लेकर विपक्ष लगातार हसीना सरकार पर सवाल उठाता रहा।

अदालत के बाहर जश्न और देश में बढ़ता राजनीतिक तनाव

फैसला आते ही अदालत कक्ष और बाहर मौजूद लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। कई विरोधी समूहों ने नारेबाज़ी करते हुए फैसले का स्वागत किया। हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि यह उत्साह देश में राजनीतिक ध्रुवीकरण को और गहरा कर सकता है। कई मानवाधिकार संगठनों ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या मुकदमा निष्पक्ष था, खासकर तब जब इसे राजनीतिक दबाव की स्थिति में चलाया गया।

भारत-बांग्लादेश संबंधों पर असर और भविष्य की अनिश्चितता

शेख हसीना फिलहाल भारत में हैं, और ढाका ने औपचारिक रूप से उनके प्रत्यर्पण की मांग कर दी है। भारत इस पर चुप्पी साधे हुए है, जिससे दोनों देशों के संबंधों पर अनिश्चितता के बादल छाए हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता जारी रही, तो इसका असर न केवल द्विपक्षीय रिश्तों पर, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा और दक्षिण एशियाई राजनीति पर भी पड़ेगा।

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