असाराम को मिली मेडिकल जमानत
2013 के दो अलग-अलग दुष्कर्म मामलों में उम्रकैद की सज़ा काट रहे असाराम बापू को गुजरात हाईकोर्ट ने छह महीने की मेडिकल जमानत दी। जेल से बाहर आने पर आश्रम में उनका स्वागत पटाखों और आरती के साथ किया गया। कोर्ट ने साफ किया कि राहत केवल इलाज तक सीमित है और उन्हें किसी धार्मिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं है।
सोनम वांगचुक अभी भी जेल में
वहीं, लद्दाख के शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जो देश और समाज के लिए शांतिपूर्ण काम कर रहे हैं, अभी भी जोधपुर जेल में बंद हैं। उन पर “देशविरोधी गतिविधियों” का आरोप है। जनता और सोशल मीडिया पर लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि ऐसे कार्यकर्ताओं को जेल में रखना न्याय के मानकों के अनुरूप है या नहीं।
जनता का सवाल: न्याय व्यवस्था कितनी निष्पक्ष?
सोशल मीडिया और आम लोग इस अंतर पर गहरा सवाल उठा रहे हैं। क्यों एक दोषी अपराधी को जेल से राहत मिल रही है, जबकि समाज और देश के लिए काम करने वाले व्यक्ति को अभी भी सजा भुगतनी पड़ रही है? यह सवाल सिस्टम की निष्पक्षता और न्याय की विश्वसनीयता पर उठ रहे हैं।
सोनम वांगचुक की भूमिका और सराहना
सोनम वांगचुक शिक्षा और पर्यावरण सुधार के क्षेत्र में लद्दाख में लंबे समय से काम कर रहे हैं। पहले सरकार और विभिन्न संस्थानों ने उनके काम की सराहना की थी। लेकिन अब उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जा रही है। इस विरोधाभास ने जनता में असंतोष और सवालों की लहर पैदा कर दी है।
सिस्टम और न्याय पर उठ रहे सवाल
असाराम की जमानत और वांगचुक की जेल ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्याय और सिस्टम के प्रति लोगों का भरोसा कम होता जा रहा है। ऐसे समय में यह महत्वपूर्ण है कि न्याय प्रणाली सभी के लिए समान और निष्पक्ष बने, ताकि समाज में भरोसा कायम रहे और गलत संदेश न जाए।














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