महाराष्ट्र के ठाणे जिले के फांगणे गांव में एक ख़ास स्कूल चल रहा है — Aajibaichi Shala (आजीबाईची शाला), जिसे “दादियों का स्कूल” भी कहा जाता है। यहाँ 60 से 90 साल की उम्र की महिलाएँ रोज़ गुलाबी साड़ी पहनकर, स्कूल बैग लेकर, दोपहर में क्लास में आती हैं।
शिक्षा और आत्म-सम्मान का पुनरुद्धार
यह स्कूल 2016 में ज़िला परिषद के शिक्षक योगेंद्र बांगड़ और मोतिराम दालाल चैरिटेबल ट्रस्ट की मदद से शुरू किया गया था। इन दादी-महिलाओं को मराठी वर्णमाला, संख्याएं, और नर्सरी कविताएं सिखाई जाती हैं। उन्होंने स्लेट पर चॉक से लिखना सीखा है और अब वे अपने नाम हस्ताक्षर कर सकती हैं — पहले उनकी मुहर (thumb impression) होती थी।
गुलाबी साड़ी और स्कूल बैग: पहचान का प्रतीक
इन महिलाओं को उनकी साड़ी-यूनिफॉर्म के रूप में रोज़ गुलाबी नौ-गुना साड़ी दी जाती है।  यह रंग सिर्फ सुंदरता का नहीं, बल्कि सशक्तिकरण और सम्मान का प्रतीक है।  वे पारंपरिक नवरवी स्टाइल में साड़ी धोती हैं, बाल संवारती हैं, बड़े बिंदी लगाती हैं और स्कूल बैग के साथ क्लास के लिए जाती हैं। 
सिर्फ पढ़ाई नहीं — जिम्मेदारी और जुड़ाव
कक्षा सिर्फ अक्षरज्ञान का नहीं है, बल्कि हर छात्रा ने अपने नाम का पौधा स्कूल परिसर में लगाया है और रोज़ उसकी देखभाल करती है। इसके अलावा, यहां कोई गृहकार्य या परीक्षा नहीं होती — लेकिन उनकी सफलता को पुरस्कृत किया जाता है, और उन्हें समय-समय पर पिकनिक जैसी गतिविधियों का आनंद भी दिया जाता है।
उम्र की सीमाएँ मिटा कर शिक्षा की शक्ति
Aajibaichi Shala की टैगलाइन है: “शिक्षणाला वयाचे बंधन नाही” — यानी “शिक्षा के लिए उम्र कोई बाधा नहीं है।”  यह पहल उन महिलाओं को आत्म-सम्मान और आत्मनिर्भरता देती है जो बचपन में पढ़ने का मौका नहीं पा सकीं।  उनके द्वारा हस्ताक्षर करना (नाम लिखना) सिर्फ शैक्षणिक उपलब्धि नहीं — पहचान की जीत है। 














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