सिग्नल-फ्री शहर: शहरी गतिशीलता में नया नजरिया
सिग्नल-फ्री शहर शहरी गतिशीलता के डिजाइन में एक बड़ा बदलाव दर्शाते हैं। इससे न केवल ट्रैफिक जाम और यात्रा समय कम होता है, बल्कि ईंधन की खपत और प्रदूषण भी घटता है, जिससे हवा की गुणवत्ता बेहतर होती है और शहर अधिक टिकाऊ बनते हैं।
कोटा का मॉडल और इसकी विशेषताएं
राजस्थान का कोटा अब शहरी पुनर्निर्माण के नए में प्रवेश कर चुका है। शहर में अब इलेक्ट्रॉनिक ट्रैफिक लाइट्स पर निर्भरता नहीं है। इसके बजाय, सड़क नेटवर्क और इंफ्रास्ट्रक्चर को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि वाहन लगातार और सुरक्षित रूप से चल सकें। इस महीने कोटा भारत का पहला ऐसा शहर बन गया जो पूरी तरह से ट्रैफिक सिग्नल-फ्री है।
कोटा की इस सफलता का आधार ग्रेड-सेपरेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर है। महत्वपूर्ण चौराहों पर फ्लाईओवर्स और अंडरपास बनाए गए हैं, जिससे ट्रैफिक लाइट्स की जरूरत कम हुई। रिंग रोड्स के चारों ओर वाहनों को मार्गदर्शन करते हैं और राउंडअबाउट्स और एकतरफा सड़कें सतत प्रवाह सुनिश्चित करती हैं। स्पष्ट साइनबोर्ड, लेन डिसिप्लिन और सड़क मार्किंग्स भी इस डिज़ाइन-आधारित मॉडल का हिस्सा हैं। पीक आवर्स में यातायात स्वयंसेवक और पुलिस पैदल यात्रियों को मार्गदर्शन करती है।
भारत में अन्य उदाहरण
हालांकि हर शहर को सिग्नल-फ्री बनाना संभव नहीं है। इंदौर, जिसे लगातार आठ साल तक भारत का सबसे स्वच्छ शहर चुना गया है, ‘स्मार्ट’ ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से सिग्नल-फ्री बनने की दिशा में काम कर रहा है। झारखंड का बोकारो स्टील सिटी भी लंबे समय से न्यूनतम ट्रैफिक लाइट्स के साथ कार्य कर रहा है। हैदराबाद जैसे शहरों में, फ्री-लेफ्ट टर्न जैसे उपाय अपनाए जा रहे हैं ताकि जाम कम हो और वाहनों का प्रवाह बेहतर हो।
सिग्नल-फ्री बनाम स्मार्ट सिग्नल
सिग्नल-फ्री शहरों में ट्रैफिक जाम, यात्रा समय, ईंधन खपत और प्रदूषण में कमी आती है। ग्रेड-सेपरेटेड चौराहे और राउंडअबाउट्स के कारण टकराव की संभावना कम होती है। सतत प्रवाह से पीछे से टकराने की घटनाएं भी घटती हैं, और सार्वजनिक परिवहन, लॉजिस्टिक्स और आपातकालीन सेवाओं के लिए यात्रा समय अधिक अनुमानित और विश्वसनीय होता है।
वैश्विक दृष्टिकोण और भारत में चुनौतियां
विश्व स्तर पर पूरी तरह सिग्नल-फ्री शहर दुर्लभ हैं। भूटान की थिंफु और ब्रिटेन का स्टीवनज जैसी जगहों पर अधिकतर जंक्शन्स राउंडअबाउट्स और मैन्युअल ट्रैफिक प्रबंधन पर आधारित हैं। भारत में, चंडीगढ़ ने शुरू में सिग्नल-मुक्त राउंडअबाउट्स पर निर्भर किया था। लेकिन जैसे-जैसे आबादी और वाहन संख्या बढ़ी, सुरक्षा और जाम के कारण कई चौराहों पर लाल बत्तियां लगानी पड़ीं।
इस प्रकार, कोटा जैसे मध्यम आकार के शहर का मॉडल बड़े और घनी आबादी वाले शहरों में सीधे लागू करना मुश्किल है। डिज़ाइन-आधारित प्रणालियों के लिए भी सड़क संकेत, रखरखाव और नियमों का पालन जरूरी है, ताकि गलत और असुरक्षित ड्राइविंग से बचा जा सके।















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