Advertisement

Nagaland का हॉर्नबिल फेस्टिवल: भारत का सबसे पर्यावरण-अनुकूल और प्लास्टिक-मुक्त उत्सव

Hornbill Festival in Nagaland showcasing eco-friendly, zero-plastic and sustainable cultural celebrations with traditional performances and green initiatives.

हॉर्नबिल फेस्टिवल क्या है? एक झलक इस अनोखे उत्सव की

नागालैंड का हॉर्नबिल फेस्टिवल, जिसे “फ़ेस्टिवल ऑफ फ़ेस्टिवल्स” कहा जाता है, राज्य की 17 जनजातियों की संस्कृति, कला, संगीत, नृत्य, परंपराओं और खानपान को एक साथ लाता है। हर साल दिसंबर में आयोजित होने वाला यह उत्सव न सिर्फ पर्यटकों के लिए आकर्षण है, बल्कि नागालैंड की सांस्कृतिक पहचान का सबसे बड़ा मंच भी है। 2025 में इसका 26वां संस्करण राष्ट्रगान के साथ भव्य रूप से शुरू हुआ, जिसमें देश-विदेश से हजारों लोग शामिल हुए।

कचरा-मुक्त और प्लास्टिक-मुक्त आयोजन की पहल

इस साल के हॉर्नबिल फेस्टिवल ने पूरे देश के लिए स्थिरता (sustainability) का नया मानक स्थापित किया है। फेस्टिवल स्थल पर सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पूरी तरह प्रतिबंधित है। सभी गीले कचरे को कम्पोस्ट किया जा रहा है, और हर दुकान व स्टॉल से कचरा अलग-अलग वर्गों में इकट्ठा किया जा रहा है। यह बदलाव दिखाता है कि कोई भी बड़ा आयोजन बिना प्लास्टिक के पूरी तरह सफल हो सकता है।

बांस की स्ट्रॉ और पत्तों की प्लेटें—परंपरा और प्रकृति का सुंदर संगम

फेस्टिवल में प्लास्टिक की जगह बांस की स्ट्रॉ, केले के पत्तों की प्लेटें, और स्थानीय प्राकृतिक सामग्री से बने उपयोगी सामान इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इससे न केवल कचरा कम हुआ है, बल्कि स्थानीय कारीगरों को भी रोजगार मिला है। हॉर्नबिल फेस्टिवल इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि परंपरा और पर्यावरण संरक्षण एक साथ चल सकते हैं।

पर्यावरण पर बड़ा प्रभाव: साफ़ हवा और हरियाली की ओर कदम

इस साल के ज़ीरो-वेस्ट मॉडल ने पर्यावरण पर बड़ा असर डाला:
• 10 लाख से ज्यादा प्लास्टिक आइटम्स का उपयोग टला
• 50 मीट्रिक टन कार्बन उत्सर्जन रोका गया
• स्वच्छ हवा, हरा-भरा वातावरण और बेहतर कचरा प्रबंधन सुनिश्चित हुआ

ये आंकड़े दिखाते हैं कि एक उत्सव भी पर्यावरण के लिए बड़ा बदलाव ला सकता है, अगर योजना और इच्छाशक्ति मजबूत हो।

पूरे भारत के लिए एक मॉडल—अब आपकी शहर की बारी

हॉर्नबिल फेस्टिवल सिर्फ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पूरा रोडमैप है कि देश में हर आयोजन कैसे पर्यावरण-हितैषी और टिकाऊ बन सकता है। चाहे वह शहर का दुर्गा पूजा हो, गणेश चतुर्थी हो, कॉलेज फेस्ट हो या राज्य स्तरीय मेला—हर आयोजन इस मॉडल को अपना सकता है। अब समय है कि आयोजक, युवा, सामुदायिक नेता और प्रशासन इस पहल को आगे बढ़ाएं और अपने शहर को भी “ज़ीरो-वेस्ट” बनाने में योगदान दें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *