नई परिभाषा से अरावली की सुरक्षा कमजोर
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सरकार की नई परिभाषा को स्वीकार किया है, जिसमें केवल वही ज़मीन “पहाड़ी” मानी जाएगी जो आसपास की जमीन से 100 मीटर से अधिक ऊँची हो। सुनने में यह तकनीकी नियम लगता है, लेकिन इसके असर गंभीर हैं। अरावली, जो लगभग 1.5 अरब साल पुरानी हैं, का एक बड़ा हिस्सा अब पहाड़ी ही नहीं माना जाएगा। पहचान खत्म होने का मतलब है कि कानूनी सुरक्षा भी समाप्त हो जाएगी।
विकास के लिए खुला रास्ता
नई परिभाषा से माइनिंग, कंस्ट्रक्शन और रियल एस्टेट विस्तार के लिए रास्ता साफ हो जाएगा। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इससे अरावली की प्राकृतिक संरचना और दिल्ली की इकोसिस्टम पर गंभीर असर पड़ेगा। यह विवाद केवल पहाड़ियों तक सीमित नहीं है, बल्कि दिल्ली और उत्तर भारत के पर्यावरण और जलवायु के भविष्य से जुड़ा है।
दिल्ली के लिए अरावली की अहमियत
अरावली दिल्ली की प्राकृतिक ढाल का काम करती हैं। ये राजस्थान की धूल को रोकती हैं, भूजल को भरने में मदद करती हैं और तापमान को संतुलित रखती हैं। अगर ये कमजोर हो गईं, तो प्रदूषण पूरे साल रहेगा, मानसून में बाढ़ का खतरा बढ़ेगा, और बाकी महीनों में पानी की कमी और गर्मी बढ़ जाएगी।
प्रकृति और भविष्य का सवाल
यह राजनीति का मुद्दा नहीं, बल्कि विज्ञान और प्राकृतिक सुरक्षा का मामला है। एक बार पहाड़ नष्ट हो गए, तो उन्हें दोबारा बनाया नहीं जा सकता। इसलिए अरावली पर हो रहे बदलाव को गंभीरता से देखा जाना चाहिए और प्रदूषण और जलवायु संतुलन को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।













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