यह महज दो अलग-अलग शहरों की खबरें नहीं हैं, बल्कि पूरे भारत की शिक्षण संस्थाओं में गहरे पैठे एक गंभीर संकट की ओर इशारा करती हैं। दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल के कक्षा 10 के छात्र और जयपुर के एक नामी स्कूल की कक्षा 4 की मासूम छात्रा, दोनों ने स्कूल में कथित तौर पर हुए मानसिक उत्पीड़न के बाद आत्महत्या कर ली। ये घटनाएं हमें मजबूर करती हैं कि हम सवाल करें: क्या हमारे शिक्षण संस्थान, जिन्हें ज्ञान और सुरक्षा का केंद्र होना चाहिए, आज हमारे बच्चों के लिए मानसिक तनाव और असुरक्षा का कारण बन रहे हैं?
दिल्ली का मामला: सीसीटीवी फुटेज और अध्यापकों पर आरोप
दिल्ली की घटना में, 10वीं कक्षा के छात्र की आत्महत्या के मामले में पुलिस ने चार शिक्षकों पर ‘आत्महत्या के लिए उकसाने’ का मामला दर्ज किया है। जांच के दौरान पुलिस को सीसीटीवी फुटेज मिला है जिसमें आरोपी शिक्षकों में से एक को ड्रामा क्लास के दौरान छात्र से बात करते देखा जा सकता है। छात्र के पिता ने आरोप लगाया है कि शिक्षकों ने उनके बेटे को मानसिक रूप से परेशान किया, जिसमें उसे धमकी देना और शारीरिक रूप से धक्का देना भी शामिल है। सबसे हृदय विदारक बात यह है कि छात्र ने अपने बैग में एक सुसाइड नोट छोड़ा, जिसमें उसने अपने परिवार से माफी मांगते हुए लिखा, “मेरे स्कूल के शिक्षक ऐसे हैं।” यह वाक्य शिक्षण संस्कृति में व्याप्त उदासीनता और कठोरता पर एक गहरा आक्षेप है।
जयपुर की बच्ची: 45 मिनट तक मदद की गुहार, मिला अपमान
जयपुर में, 9 साल की अमायरा कुमार मीना ने कथित बुलींग से परेशान होकर स्कूल की चौथी मंजिल से कूदकर जान दे दी। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की जांच रिपोर्ट के निष्कर्ष और भी चौंकाने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार, छात्रा ने अपनी क्लास टीचर से 45 मिनट के भीतर पाँच बार संपर्क किया और मदद मांगी, लेकिन टीचर ने सहयोग करने के बजाय उसे बार-बार डांटा और ऐसी बातें कहीं जिससे “पूरी क्लास हैरान रह गई।” रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि अमायरा 18 महीनों से बुलींग का शिकार हो रही थी और उसके माता-पिता की बार-बार की शिकायतें भी अनसुनी की गईं। यहाँ तक कि सबूत मिटाने के लिए स्कूल अधिकारियों द्वारा उस जगह को धो दिया गया जहाँ बच्ची गिरी थी।
शिक्षण संस्कृति पर गंभीर प्रश्न
ये दोनों घटनाएं स्कूल के अंदर की ‘शिक्षण संस्कृति’ पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। शिक्षकों का मुख्य कार्य केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि छात्रों को सुरक्षित, सहायक और पोषण देने वाला वातावरण प्रदान करना है। जब बच्चे बुलींग या मानसिक परेशानी की शिकायत लेकर शिक्षक के पास जाते हैं, और उन्हें मदद के बजाय उपहास, डांट या धमकी मिलती है, तो वे पूरी व्यवस्था में अपना विश्वास खो देते हैं। अमायरा के मामले में, “टीचर का हस्तक्षेप बहुत जरूरी था,” यह CBSE की टिप्पणी शिक्षकों की जिम्मेदारी को रेखांकित करती है। भारत भर के स्कूलों में, यह ‘एडजस्ट करने’ या ‘ड्रामा करने’ की कहकर छात्रों की भावनाओं को खारिज करने की संस्कृति अब जानलेवा साबित हो रही है।
देशव्यापी संकट और तत्काल आवश्यकता
यह घटनाएं केवल दिल्ली या जयपुर की समस्या नहीं हैं, बल्कि यह देशव्यापी शिक्षा प्रणाली का एक गंभीर और भयावह चेहरा दिखाती हैं। जब एक छात्र आत्महत्या जैसा अंतिम कदम उठाता है, तो इसकी जवाबदेही केवल माता-पिता या बच्चे पर नहीं डाली जा सकती। शिक्षकों, स्कूल प्रशासन और शिक्षा बोर्ड को अपनी भूमिका की समीक्षा करनी होगी। यह जरूरी है कि स्कूलों में एक मजबूत शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal Mechanism) हो, शिक्षकों को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील बनाया जाए और ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के साथ बुलींग को जड़ से खत्म किया जाए। हमारे बच्चों को सुरक्षित, खुश और तनाव मुक्त वातावरण मिलना उनका मौलिक अधिकार है।















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