नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के Gen-Z को लेकर दिए गए बयान पर अब राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हो गई है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस मुद्दे पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि मोहन भागवत को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं के सामने मौजूद वास्तविक समस्याओं पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। इसी बीच, इस बयान को लेकर राजनीतिक गलियारों में नई बहस छिड़ गई है।
क्या है पूरा मामला?
मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम के दौरान नई पीढ़ी यानी Gen-Z का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि देश के युवाओं में अपार क्षमता है। साथ ही, उन्होंने युवाओं पर भरोसा जताने की बात कही। उनका मानना था कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर युवा देश को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं।
इसके बाद, कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी की प्रतिक्रिया सामने आई। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात रखने का अधिकार है। हालांकि, केवल भरोसा जताना पर्याप्त नहीं है। युवाओं की वास्तविक चुनौतियों का समाधान भी जरूरी है।
प्रियंका गांधी ने क्या कहा?
संसद परिसर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान प्रियंका गांधी ने कहा, “उन्हें अपनी बात कहने का अधिकार है।” साथ ही, उन्होंने कहा कि आज का युवा रोजगार, शिक्षा और अपने भविष्य को लेकर चिंतित है।
उन्होंने कहा कि युवाओं की आकांक्षाओं को समझना समय की मांग है। इसके अलावा, सरकार को ऐसे कदम उठाने चाहिए, जिनसे युवाओं को बेहतर अवसर मिल सकें। उनका कहना था कि केवल सकारात्मक बातें करने के बजाय ठोस नीतियों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
Gen-Z पर क्यों हो रही है चर्चा?
पिछले कुछ वर्षों में भारत में Gen-Z को लेकर लगातार चर्चा बढ़ी है। दरअसल, 1997 से 2012 के बीच जन्मी इस पीढ़ी ने डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया के दौर में परवरिश पाई है। यही वजह है कि राजनीतिक दल भी इस वर्ग तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले चुनावों में Gen-Z मतदाता अहम भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में, युवाओं से जुड़े मुद्दे लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं।

संसद से लेकर राजनीति तक चर्चा
मोहन भागवत के बयान के बाद संसद के भीतर और बाहर इस विषय पर चर्चा तेज हो गई। वहीं, भाजपा नेताओं ने उनके बयान को युवाओं के प्रति सकारात्मक सोच बताया। दूसरी ओर, विपक्ष ने रोजगार, शिक्षा और अवसरों जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
विपक्ष का कहना है कि युवाओं का विश्वास केवल बयानों से नहीं जीता जा सकता। इसके लिए रोजगार सृजन और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है।
युवाओं के मुद्दे फिर बने केंद्र में
पिछले कुछ समय से प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और शिक्षा व्यवस्था को लेकर लगातार बहस हो रही है। इसी कारण, मोहन भागवत के बयान और प्रियंका गांधी की प्रतिक्रिया को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले समय में भी युवाओं से जुड़े मुद्दे राजनीति के केंद्र में बने रहेंगे। कुल मिलाकर, सभी राजनीतिक दल इस वर्ग का समर्थन हासिल करने की कोशिश करते नजर आएंगे।
राजनीतिक मायने क्या हैं?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम को केवल बयानबाजी के रूप में नहीं देखा जा सकता। एक ओर मोहन भागवत ने युवाओं की क्षमता और उन पर भरोसा जताया। वहीं प्रियंका गांधी ने रोजगार, शिक्षा और अवसरों जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देने की बात कही।
नतीजतन, यह बहस अब केवल एक बयान तक सीमित नहीं रही है। आने वाले दिनों में अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ सकती हैं। ऐसे में Gen-Z और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक चर्चा और तेज होने की संभावना है।












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